वायु प्रदूषण 2025: 2025 में वायु प्रदूषण अभी भी दुनिया भर में स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया की 99% आबादी प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर है और विशेषकर भारत जैसे देश इसके सबसे अधिक प्रभावित हैं। भारत का औसत PM2.5 स्तर WHO की सुरक्षित सीमा से 10 गुना अधिक है, जो सीधे तौर पर हमारी सेहत को खतरे में डाल रहा है।

स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव
वायु प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर श्वसन तंत्र पर पड़ता है। PM2.5 और PM10 जैसे अतिसूक्ष्म कण हवा में घुलकर फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं, जिससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, COPD, फेफड़ों का कैंसर और बार-बार खांसी जैसी समस्याएं होती हैं। अस्पतालों में सांस संबंधी बीमारियों के मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है।

दूसरे अंगों पर असर
प्रदूषित हवा में मौजूद खतरनाक कण हृदय को भी प्रभावित करते हैं। ये कण रक्त वाहिकाओं में घुसकर उच्च रक्तचाप, हृदयाघात, स्ट्रोक और दिल की बीमारियों का जोखिम बढ़ाते हैं। शोधों से पता चला है कि वायु प्रदूषण मस्तिष्क की कोशिकाओं में सूजन पैदा कर सकता है, जिससे याददाश्त कमजोर होना, तनाव, अवसाद और तंत्रिका संबंधी विकार हो सकते हैं।
संवेदनशील वर्ग पर असर
बच्चे, बुजुर्ग, बाहरी श्रमिक और पहले से श्वसन रोग से पीड़ित लोगों पर वायु प्रदूषण का सबसे
ज्यादा असर होता है। ये लोग ज्यादा आसानी से बीमार पड़ सकते हैं और उनकी बीमारियां जल्दी बढ़ सकती हैं।
वैश्विक और आर्थिक प्रभाव
वायु प्रदूषण सिर्फ स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाता है। भारत जैसे
देशों में प्रदूषण के कारण प्रत्येक वर्ष जीडीपी का 3% नुकसान होता है। इसके अलावा, प्रदूषण के
कारण स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च बढ़ता है और उत्पादकता कम होती है।