नेहा सिंह राठौर : भारतीय सोशल मीडिया कभी-कभी एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ता है, जहां एक छोटी सी चिंगारी पूरे परिदृश्य को बदल देती है। इस बार की चिंगारी है लोक गायिका# नेहा सिंह राठौर और पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू के बीच का एक कथित फोन कॉल, जो नेहा के द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो से जुड़ा हुआ है। लेकिन असल में यह विवाद नेहा के पाहलगाम आतंकी हमले पर सोशल मीडिया पोस्ट्स से शुरू हुआ था, जो सेडिशन चार्जेस तक पहुंच गया। अब जस्टिस काटजू का व्यंग्यात्मक कविता और फोन कॉल का जिक्र सोशल मीडिया को हिला रहा है। आइए, इस पूरे ड्रामे को 600 शब्दों में समझते हैं – जहां अभिव्यक्ति की आजादी, राजनीतिक आलोचना और ट्रोलिंग का मेलजोल एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।

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नेहा सिंह राठौर: आवाज जो सवाल उठाती है
#नेहा सिंह राठौर कोई नई नाम नहीं हैं सोशल मीडिया की दुनिया में। भोजपुरी लोक गायिका और राजनीतिक व्यंग्यकार के रूप में वे 2020 से ही चर्चा में हैं। उनके गाने जैसे ‘बिहार में का बा’, ‘यूपी में का बा’ ने प्रवासी मजदूरों की पीड़ा, कोविड महामारी, लखीमपुर खीरी हिंसा और हथरस गैंगरेप जैसी घटनाओं पर सीधा प्रहार किया। ये गाने यूट्यूब, इंस्टाग्राम और एक्स (पूर्व ट्विटर) पर वायरल हुए, लाखों व्यूज बटोरे। #नेहा की शादी 2022 में हिमांशु सिंह से हुई, लेकिन उनकी कलम और आवाज कभी रुकी नहीं। वे खुद को ‘फोक सिंगर’ कहती हैं, लेकिन उनके वीडियोज राजनीतिक सटायर से भरे हैं।

समस्या तब शुरू हुई जब 22 अप्रैल 2025 को पाहलगाम (कश्मीर) में एक भयानक आतंकी हमला हुआ। 26 पर्यटकों की मौत हो गई, ज्यादातर हिंदू। हमलावरों ने पीड़ितों से धर्म पूछा और फिर गोली मार दी। नेहा ने एक्स पर पोस्ट्स किए, जिसमें उन्होंने सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि क्या यह हमला बिहार चुनावों के लिए राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? उन्होंने पीएम मोदी से पूछा, “टूरिस्ट्स की सिक्योरिटी का क्या?” उनके पोस्ट्स में धार्मिक एंगल आया, और उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी सैनिकों की जान जोखिम में डाल रही है पड़ोसी देश से युद्ध के लिए। ये पोस्ट्स पाकिस्तानी मीडिया में वायरल हो गए, जहां उन्हें सरकार-विरोधी बयानबाजी के तौर पर दिखाया गया।
सेडिशन का केस: अभिव्यक्ति की कीमत
परिणामस्वरूप, 27 अप्रैल 2025 को लखनऊ के हजरतगंज थाने में एक कवि अभय प्रताप सिंह की शिकायत पर
नेहा के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। धाराएं: बीएनएस की 197(1)(ए), 197(1)(डी) – राष्ट्र की संप्रभुता, एकता को
खतरे में डालने वाली फर्जी खबरें, और 353(2) – विद्रोह भड़काना। आरोप: साम्प्रदायिक तनाव फैलाना, एंटी-नेशनल स्टेटमेंट्स। नेहा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन 19 सितंबर 2025 को कोर्ट ने खारिज कर दी।
जस्टिस राजेश सिंह चौहान और सैयद कमर हसन रिजवी की बेंच ने कहा, “आर्टिकल 19(1)(ए) अभिव्यक्ति की आजादी
देता है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता के लिए प्रतिबंध हैं। नेहा के पोस्ट्स में पीएम का नाम अपमानजनक तरीके से इस्तेमाल हुआ, धर्म-राजनीति का मिश्रण किया।” कोर्ट ने जांच में सहयोग का आदेश दिया।
- सुप्रीम कोर्ट में भी अपील हुई। 13 अक्टूबर 2025 को कपिल सिब्बल ने
- दलील दी, “ट्वीट के लिए विद्रोह का चार्ज?
- यह असंवैधानिक है।” लेकिन कोर्ट ने खारिज कर दिया। नवंबर 2025
- में वाराणसी पुलिस ने समन जारी किया,
- और अफवाहें उड़ीं कि नेहा गिरफ्तार हो गईं। नेहा ने वीडियो जारी कर
- कहा, “यह झूठ है। मैंने सिर्फ सवाल पूछा
- था।” एक कोर्ट ने शिकायत खारिज की, लेकिन मुख्य केस चल रहा है।
जस्टिस काटजू का प्रवेश: व्यंग्य का तीर
अब आते हैं मुख्य विवाद पर। मई 2025 में नेहा ने जस्टिस काटजू के साथ एक वीडियो शेयर किया, जिसमें गंभीर
चर्चा दिखी। इससे पहले कपिल सिब्बल के साथ वीडियो था। लेकिन नवंबर 2025 में काटजू ने नेहा पर तंज कसा।
फेसबुक पर एक कविता लिखी: “कान पकड़कर उठक बैठक करत बा” – व्यंग्य में नेहा की आलोचना। फिर 26
नवंबर को वायरल कविता: “जब तुम जेल में होगी, मैं तुम्हारे लिए अंडा, मुर्गी, मछली, बिरयानी, टोस्ट, कचौरी,
जलेबी, इमरती रोज लाया करूंगा।” काटजू ने कहा, नेहा उनसे नाराज हैं, फोन नहीं उठातीं। यह कविता सोशल
मीडिया पर ट्रोलिंग का कारण बनी। नेहा ने इसे ‘फोन कॉल’ का हिस्सा बताया, लेकिन असल में यह काटजू का
सटायर था नेहा की ‘राजनीतिक महत्वाकांक्षा’ पर।
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सोशल मीडिया का हंगामा: ट्रोल्स vs सपोर्टर्स
यह विवाद एक्स पर आग की तरह फैला। #NehaSinghRathore ट्रेंडिंग हुआ।
एक तरफ ट्रोल्स: “नेहा को जेल
में डालो, सैनिकों का अपमान किया!” (फ्लाइट लेफ्टिनेंट अनूप वर्मा जैसे यूजर्स)।
दूसरी तरफ सपोर्टर्स: “अभिव्यक्ति
की आजादी का हनन!” (अभिषेक गोयल जैसे वकील)। काटजू की कविता पर मीम्स बने,
नेहा को ‘कान पकड़कर’
दिखाया गया। व्यूज लाखों में, रीपोस्ट हजारों। यह दिखाता है कैसे सोशल मीडिया राजनीति को अम्प्लिफाई करता
है। जस्टिस काटजू ने खुद एक आर्टिकल में कहा, “लोकतंत्र में सरकार की आलोचना का अधिकार है, लेकिन नेहा
ने हिंसा नहीं भड़काई, सिर्फ क्रिटिसाइज किया।”
निष्कर्ष: सवाल बाकी, बहस जारी
- यह विवाद सिर्फ नेहा या काटजू का नहीं, बल्कि सोशल मीडिया की पावर
- और फ्री स्पीच का है। नेहा की आवाज
- दबाई जा रही है या जायज सवाल? काटजू का व्यंग्य हास्य है या चोट? 2025
- के अंत में, जब पाहलगाम की यादें
- ताजा हैं, यह हमें सोचने पर मजबूर करता है – क्या हमारी आजादी ‘राष्ट्रहित’
- के नाम पर सीमित हो रही है? नेहा
- की तरह, कई कलाकार चुप हैं, लेकिन सोशल मीडिया हिल चुका है। शायद
- यही लोकतंत्र की खूबसूरती है –
- विवाद से ही बदलाव आता है।