चीन का नया संकट: चीन आज सिर्फ आर्थिक मंदी या रियल एस्टेट संकट की वजह से चर्चा में नहीं है, बल्कि मानवाधिकार उल्लंघन और उत्पीड़न के बढ़ते आरोपों ने उसे वैश्विक कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ दुनिया चीन की आर्थिक ताकत को देख रही है, तो दूसरी तरफ उसके अंदरूनी दमनकारी कदमों पर गहरी चिंता भी जता रही है।

आर्थिक संकट और असंतोष की बढ़ती ज़मीन
बीते कुछ सालों में चीन की रियल एस्टेट इंडस्ट्री गहरे संकट में फंस चुकी है, जिससे बैंकों के डूबते कर्ज़, घटती खपत और बेरोजगारी जैसी समस्याएं तेज़ हो गई हैं। सरकार ने नियमों में ढील, सस्ते लोन और टैक्स कटौती जैसे कई कदम उठाए, लेकिन अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने में ये उपाय अब तक सीमित ही साबित हुए हैं।
जब अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है, तो आम लोगों में असंतोष और सवाल दोनों बढ़ते हैं, और यही वह बिंदु है जहां सख्त राजनीतिक नियंत्रण और उत्पीड़न के आरोपों की चर्चा और तेज हो जाती है। विश्लेषकों का मानना है कि चीन की नेतृत्व व्यवस्था स्थिरता के नाम पर आवाज़ों को नियंत्रित करने की कोशिश और तेज कर रही है।
निगरानी राज्य और नागरिक स्वतंत्रता
चीन को आज दुनिया के सबसे बड़े “सर्विलांस स्टेट” यानी निगरानी राज्य के रूप में देखा जाता है, जहां इंटरनेट, कैमरों और डिजिटल तकनीक के ज़रिए नागरिकों पर कड़ी नज़र रखी जाती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मैसेजिंग ऐप और ऑनलाइन कंटेंट पर सख्त सेंसरशिप लागू है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता गंभीर रूप से सीमित हो जाती है।
रिपोर्टों के अनुसार, कई टेक कंपनियां सरकारी निगरानी व्यवस्था को तकनीकी सहयोग देती हैं, जिससे आम नागरिकों की प्राइवेसी लगभग ख़त्म होती दिखाई देती है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस तरह की व्यापक निगरानी व्यवस्था असहमति की हर कोशिश को शुरुआत में ही कुचल देने का औज़ार बन चुकी है।
अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के आरोप
चीन पर सबसे गंभीर आरोप उसके अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर मुस्लिम उइगरों के संदर्भ में
लगाए जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लंबे समय से यह आरोप दोहराए जा रहे हैं कि उइगरों को
“री-एजुकेशन कैंप”, निगरानी, धार्मिक आज़ादी पर रोक और जबरन समरसकरण जैसी नीतियों
बीजिंग इन आरोपों को “आतंकवाद और चरमपंथ के खिलाफ सख्ती” बताकर सही ठहराने की
कोशिश करता है, लेकिन कई पश्चिमी देश और मानवाधिकार संगठन इसे व्यवस्थित उत्पीड़न
की श्रेणी में रख रहे हैं। यही वजह है कि चीन की छवि सिर्फ एक आर्थिक महाशक्ति नहीं, बल्कि
कठोर आंतरिक नियंत्रण वाले राज्य के रूप में भी उभर रही है।
दुनिया की प्रतिक्रिया और कूटनीतिक दबाव
अमेरिका, यूरोपीय देशों और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने मानवाधिकार उल्लंघन के मुद्दे पर चीन पर
प्रतिबंध, आलोचनात्मक प्रस्ताव और कड़े बयान जैसी प्रतिक्रियाएं दी हैं। कुछ देशों ने चीनी अधिकारियों
और कंपनियों पर लक्षित प्रतिबंध लगाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि उत्पीड़न की कीमत
सिर्फ अंदरूनी नहीं, बाहरी मोर्चे पर भी चुकानी पड़ेगी।
हालांकि, चीन की विशाल अर्थव्यवस्था और व्यापारिक नेटवर्क के कारण कई देश पूरी तरह टकराव
से बचते हुए “संतुलित” रुख अपनाने की कोशिश भी करते हैं। यही वजह है कि एक तरफ सख्त
बयानबाज़ी होती है, तो दूसरी तरफ व्यापार और निवेश के रिश्ते भी चलते रहते हैं।
चीन के लिए आगे का रास्ता
चीन के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह आर्थिक स्थिरता और राजनीतिक नियंत्रण के बीच
संतुलन बना पाएगा, या दमनकारी नीतियां उसके खिलाफ ही माहौल तैयार कर देंगी। अगर उत्पीड़न
के आरोप और कड़े होते गए, तो विदेशी निवेश, तकनीकी सहयोग और कूटनीतिक संबंधों पर इसका
दूसरी ओर, अगर बीजिंग अधिक पारदर्शिता, न्यायपूर्ण कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों को जगह
देने की दिशा में कदम बढ़ाए, तो न सिर्फ उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधरेगी, बल्कि भीतर की असंतुष्टि भी
कम की जा सकती है। दुनिया की नज़र अब सिर्फ इस बात पर है कि चीन अपने “नए संकट” से निपटने
के लिए दमन को बढ़ाएगा या सुधार की दिशा में कोई नया अध्याय शुरू करेगा।