गुरु तेगबहादुर सिंह जी: सिख धर्म के नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी, विश्व इतिहास में धर्म, मानवता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले महान योद्धा और संत के रूप में अमर हैं। उन्हें “हिंद की चादर” कहा जाता है| ठंडी हवाओं और गर्मी से बचाने वाली चादर की तरह, गुरु जी ने औरंगजेब के अत्याचारों से हिंदू धर्म और संस्कृति को ढककर सुरक्षित रखा। उनकी यह अमर गाथा आज भी

प्रारंभिक जीवन और नामकरण
गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 1 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था। उनके पिता सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद सिंह जी, और माता जी का नाम माता नानकी था। बचपन में उनका नाम त्यागमल था, जो उनके वैरागी और त्यागपूर्ण स्वभाव को दर्शाता था। मात्र 13-14 वर्ष की आयु में उन्होंने पिता के साथ मुगल सेना के खिलाफ युद्ध में अद्भुत वीरता दिखाई। एक लड़ाई में उनकी बहादुरी देखकर गुरु हरगोबिंद जी ने उन्हें “तेग बहादुर” (तलवार के बहादुर) की उपाधि दी।
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गुरु पद और देशाटन
1664 में आठवें गुरु हरकृष्ण जी की असामयिक मृत्यु के बाद वे सिखों के नौवें गुरु बने। गुरु पद संभालने के बाद उन्होंने पूरे भारत की यात्राएं कीं। असम, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में घूमकर उन्होंने गुरु नानक देव जी के संदेश – एकता, समानता, भक्ति और सेवा – का प्रचार किया। जहां-जहां वे गए, वहां लंगर की व्यवस्था की, कुएं खुदवाए और लोगों को सदाचार का पाठ पढ़ाया। उन्होंने आनंदपुर साहिब को मजबूत आधार बनाया, जो बाद में सिख इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
औरंगजेब का अत्याचार और कश्मीरी पंडितों की गुहार
17वीं शताब्दी में मुगल सम्राट औरंगजेब का शासन था, जो धार्मिक कट्टरता के लिए कुख्यात था।
उसने जजिया कर लगाया, मंदिर तोड़े और गैर-मुस्लिमों, विशेषकर हिंदुओं पर जबरन धर्म परिवर्तन
की नीति अपनाई। कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार चरम पर थे। कश्मीर के मुगल गवर्नर इफ्तिखार खान ने
उन्हें इस्लाम कबूल करने या मौत की धमकी दी। असहाय होकर कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल,
जिसमें पंडित किरपा राम प्रमुख थे, आनंदपुर साहिब पहुंचा और गुरु जी से मदद की गुहार लगाई।
गुरु जी का निर्णय और दिल्ली यात्रा
गुरु तेग बहादुर जी उस समय गहन चिंतन में थे। उनके नन्हे पुत्र गोबिंद राय (बाद में गुरु गोबिंद सिंह जी) ने कहा,
“पिता जी, इस संकट में आपसे बड़ा कौन सहारा दे सकता है?” गुरु जी ने निर्णय लिया कि वे स्वयं दिल्ली जाकर
औरंगजेब का सामना करेंगे। उन्होंने पंडितों को आश्वासन दिया कि वे उनकी तिलक और जनेऊ की रक्षा करेंगे।
गुरु जी ने कहा, “अगर औरंगजेब मुझे इस्लाम कबूल करवा ले, तो सभी पंडित भी कबूल कर लें।”
यह चुनौती देकर वे दिल्ली रवाना हुए।
क्रूर यातनाएं और शहादत
औरंगजेब ने गुरु जी को गिरफ्तार कर लिया। उनके तीन निष्ठावान शिष्यों – भाई मति दास,
भाई दयाला और भाई सती दास – को उनके सामने क्रूर यातनाएं दी गईं। भाई मति दास को आरे से चीरा गया,
भाई दयाला को उबालते तेल में डाला गया और भाई सती दास को आग में जलाया गया। गुरु जी अडिग रहे।
उन्होंने न इस्लाम कबूल किया, न कोई चमत्कार दिखाया। अंत में, 24 नवंबर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक
में सार्वजनिक रूप से उनका सिर कलम कर दिया गया। गुरु जी ने हंसते-हंसते बलिदान दे दिया, बिना आह भी भरी।
शहादत के बाद और स्मृति स्थल
उनके शिष्यों ने अद्भुत साहस दिखाया। भाई जैता जी ने गुरु जी का शीश आनंदपुर पहुंचाया,
जहां अंतिम संस्कार हुआ। शरीर को दिल्ली में ही संस्कार किया गया। आज वहां गुरुद्वारा
शीश गंज साहिब (शहादत स्थल) और गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब (संस्कार स्थल) स्थापित हैं।
गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा अमर करना और शिक्षाएं
गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने पिता के बलिदान को “बचित्तर नाटक” में अमर किया: “धरम हेत साका
जिनि कीआ, सीसु दीआ परु सिररु न दीआ।” अर्थात, धर्म के लिए बलिदान दिया, सिर दिया लेकिन
सिद्धांत नहीं छोड़ा। यह बलिदान केवल सिखों का नहीं, बल्कि पूरे मानवता का था। गुरु जी ने दूसरे
धर्म के लोगों की रक्षा के लिए अपना जीवन दिया, जो विश्व में दुर्लभ है। इसलिए उन्हें “हिंद की चादर”
कहा गया – हिंदुस्तान की रक्षा करने वाली चादर।
गुरु तेगबहादुर सिंह जी: आध्यात्मिक योगदान और प्रासंगिकता
गुरु तेग बहादुर जी के 116 शबद गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं, जो भक्ति, वैराग्य और निर्भीकता
का संदेश देते हैं। उनका बलिदान हमें सिखाता है कि डर के आगे कभी न झुकें, कमजोरों की रक्षा करें
और सत्य के लिए खड़े रहें। आज जब धार्मिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की बात होती है,
तो गुरु जी की गाथा प्रासंगिक बनी रहती है। उनकी शहादत की 350वीं वर्षगांठ पर पूरा देश उन्हें नमन करता है।